Sunday, 21 January 2018

"बोलो गंगापुत्र " :- लुप्त प्रश्नों की समाधान गाथा



"बोलो गंगापुत्र " :- लुप्त प्रश्नों की समाधान गाथा
-------------------------------------------

माना कि समाज के लिए साहित्य दर्पण का कार्य करता है।  माना कि साहित्य कभी कभी समाज की दिशा और दशा दोनों तय कर सकता है। माना कि राजनीति  और समाज दोनों एक दुसरे के पूरक हैं लकिन बहुत कम जानते हैं कि  साहित्य, समाज और राजनीति  के मध्य एक उस पुल के समान है जिस पर हर गुज़रनेवाला  पुल की महत्ता को अनदेखा नहीं कर सकता। पुल चाहे कितना भी छोटा क्यों ना हो, दो छोरों को मिलाने का कार्य करने के साथ साथ आस पास के दृश्यों में वह कई प्रश्न मन में छोड़ जाता है जिनके उत्तर पाने के लिए यात्री  छटपटाता रहता है। प्रश्नों से कोई भी अछूता नहीं रहता । कुछ दृश्य रुपी प्रश्न तो ऐसे होते हैं कि चिरकाल तक आपके वैचारीक शक्तिः को प्रभावित करते रहते हैं और आप उनके उत्तर खोजने निकल पड़ते हैं। डॉ. पवन विजय द्वारा रचित या कहिये निर्मित ' बोलो गंगापुत्र' एक ऐसा ही पुल  है जो ,यात्रियों को (पाठकों को )  महाभारत के एक महानायक भीष्म पितामह द्वारा  उठाये गए  प्रश्नों के समाधान हेतु , उन दृश्यों को जीवंत करने में सक्षम हैं जिनके अंतस में उन सभी प्रश्नों के उत्तर छिपे हैं जिनकी कल्पना किसी भी यात्री ने नहीं की हो।

'महाभारत' ग्रन्थ को भारत का साधारण जनमानस एक धार्मिक, एक अनुकरणीय और दार्शनिक ग्रंथ मानता है। कुछ प्रतिशत बुद्धिजीवियों को छोड़ कर आधुनिक काल में बच्चों से लेकर बड़ों तक महाभारत की छवि केवल या तो भगवान श्रीकृष्ण की श्रीमद्‍भगवद्‍गीता तक ही सीमित है या किसी भी लेखक द्वारा अपनी धारणाओं के अनुसार प्रसारित पुस्तकों, पत्रिकाओं , टीवी सीरियलों ,मंचो द्व्रारा महाभारत को सत्य - असत्य , न्याय - अन्याय , अहंकार-  विनम्रता के बीच के संघर्ष के रूप में दर्शाया जाता है। लेकिन शायद ऐसा नहीं है। डॉ. पवन विजय  ' बोलो गंगापुत्र ' के रूप में हमारे सामने एक ऐसा दस्तावेज लायें हैं जिसमे इन मिथकों को कुछ हद तक अनावरण करने के साथ साथ उन तथ्यों की व्याख्या भी की है जिनसे हम सभी अनभिज्ञ रहे हैं।

मनुष्य सामाजिक प्राणी है यह तो हम अपने अध्ययन काल से ही पढ़ते आये हैं और इसी समाजिक प्राणी से ही सत्ता का निर्माण होता है। समाज फिर दो भागों में बंट जाता है। एक शासक और दूसरा शासित। यहाँ शासक का अर्थ एक मनुष्य मात्र से नहीं अपितु उस समहू से है जो समाज की दूसरी इकाई पर बनाये गए नियमों के अनुसार शासन करता है। यदि शासन ही उन नियमों का पालन नहीं करे तो सत्य की बलि होना निश्चित है और झूठ का सत्यापन अन्य पात्रों की चेतना के निहित स्वार्थ और अक्षमताओं  की धुंध में हो नहीं सकता।  महाभारत की कथा भी मेरे लिए एक धुंध के समान ही रही जिसके पार स्पष्ट देखने की मेरी विश्लेषण अक्षमता आड़े आती रही। लेकिन कुछ हद तक यह धुंध हटने लगी है। ' बोलो गंगापुत्र ' के प्रश्न और उत्तर आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने वह उस काल में होते, यदि यही प्रश्न वेदव्यास ने उठाये होते पर शायद तब हमारे समक्ष ' महाभारत' ग्रन्थ किसी दुसरे ही रूप में होता। यह तो स्थापित है कि नियति को बांधने की चेष्टा हमेशा विफल ही रही है।यह नियति ही है कि इन सभी प्रश्नो के उत्तर महाकाव्य में गुथे होने के बावजूद भी ,तीरों से बीधें  भीष्म को इस युग में ' बोलो गंगापुत्र ' में  खोजने पड़े  और यह लेखक की उच्च स्तरीय व्याख्यात्मक विश्लेषण योग्यता ही है कि हर उत्तर प्राप्ति के साथ भीष्म पितामह का शारीरिक और मानसिक तनाव घटता चला जाता है जिसका अंत  वासुदेव सहित सभी सगे सम्बन्धियों के सम्मुख  भीष्म पितामह के निर्वाण प्राप्ति में होता है

पितामह भीष्म के रूप में महाभारत एक ऐसे पात्र हैं जो एक त्याग,अनुराग, नैतिकता , निरपेक्ष , धर्म का प्रतीक रहे हैं पर क्या वास्तव में ऐसा है या था। त्याग क्यों किया गया ? अनुराग किसके प्रति था ? नैतिकता के अर्थ समयानुसार /कथानुसार गुम क्यों हो गए ? निरपेक्षता का सिद्धांत कहाँ तक सफल रहा ? और धर्म वास्तव में सत्य के प्रति उदासीन क्यों रहा? क्यों ? क्यों ? यह प्रश्न जब किसी विचारक को कटोचते हैं तो ' बोलो गंगापुत्र ' का पुस्तक रूप में अवतरण होता है। प्रश्न तब भी थे पर लुप्त थे। अपवाद को छोड़ दें तो तो एक परिवार में ,एक मोहल्ले में स्थापित निवासियों के कल्याण संघ, एक राजनीतिक पार्टी , एक संस्था, और सत्ता/ असत्ता  से जुड़े आज भी जो सक्षम हैं ,अहंकारी है, निजी हितचिंतक हैं , कुतर्कों द्वारा अपने निर्णयों को न्यायोचित  ठहरने वाले हैं , नारियों के प्रति असम्मान की भावना रखते हैं , देश के प्रति अनिष्ठावान हैं । आज भी वही प्रश्न हमारे सामने उपस्थित हैं।  वास्तव में महाभारत के सभी पात्र आज भी जीवित हैं और उनमे भीष्म जैसे उन सभी प्रश्नो के उत्तर आज की समाजिक व्यवस्था में तलाशते फिरते हैं।

डॉ पवन विजय कवि बाद में हैं सर्वप्रथम वह एक विचारक और समाजशास्त्री के रूप में हमारे समक्ष आते हैं।   ' बोलो गंगा पुत्र ' में शरशैया पर स्थापित  पितामह भीष्म के अंतस में वह सभी प्रश्न उठते हैं जिनका निवारण  एक विचारक और समाजशास्त्री  ही चाह सकता है। पाठक के रूप में मुझे भी महाभारत काव्यग्रंथ से  वह उत्तर नहीं मिल सके जिनकी अपेक्षा में वेदव्यास से करता था। डॉ पवन विजय ने उन मानवीय  प्रश्रों के उत्तर ; काल/समय , वासुदेव कृष्ण  , गंगा , अश्वत्थामा, संजय  जैसे महाभारत के पात्रों से ही दिलवाये जिससे ' बोलो गंगापुत्र ' की प्रतिष्ठा समकालीन साहित्यआकाश में ध्रुव तारे के समान हो सकती है।

"बोलो गंगापुत्र " के एक साधारण पाठक की और से डॉ पवन विजय जी को हार्दिक बधाई और शुभकामनायें। 

त्रिभवन कौल 
स्वतंत्र लेखक –कवि
$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$$
पुस्तक :- बोलो गंगापुत्र
लेखक :- डॉ. पवन विजय
प्रकाशक :-रेडग्रैब बुक्स , इलाहबाद , उ प्र। 
कीमत :- ९९/= रूपये मात्र। 

--------------------------------------------

Sunday, 7 January 2018

इत्तेफ़ाक़ (लघुकथा)


इत्तेफ़ाक़
----------
कैफे में साथ वाली टेबल से जब उसे किसी ने पुकारा तो उसने आवाज़ की दिशा में सिर घुमा कर देखा
"राकेश !"  "अरे, तुम यहाँ? क्या इत्तेफ़ाक़ है," कहते हुए उसने हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ाया राकेश बस मुस्कुरा रहा था।
बीस साल।  एक ही शहर में रहते हुए इतने लंबे अंतराल के पश्चात यह मुलाक़ात। प्रमोद राकेश को देख उतना चकित नहीं लग रहा था जितना कि भयभीत।
अपरिचितों से भरे कैफे के शोरो-गुल के बीच प्रमोद का दिमाग़ जैसे सुन्न हो गया अचंभित हो दोनों एक दूसरे को देखते रह गये
क्या है ईश्वर की इच्छा, सोचते हुए वो अतीत की यादों में गुम हो गये।
लग रहा था जैसे कल की ही बात हो। प्रमोद ने राकेश की थीसिसभ्रष्टाचार समाजिक या मानसिक रोगचुरा कर पीएचडी कर ली थी। राकेश ने इसकी शिकायत हर जगह की पर प्रमोद की पहुँच भी हर जगह थी। पीएचडी प्रमोद को ही मिली और साथ में स्थानीय कॉलेज में एक लेक्चरर  पोस्ट भी। राकेश यद्यपि टूट गया था पर उसने हार ना मान कर  और एक अन्य विषय पर पीएचडी कर यूनिवर्सिटी में लेक्चरर की पोस्ट पर नियुक्त हो गया और कालांतर में आईपीएस कैडर के द्वारा जिले का आईजी बन गया। 
अतीत से निकल कर दोनों बाहर आये तो प्रमोद ने अपने को पुलिस से गिरा पाया। 
"तुम्हारा खेल समाप्त प्रमोद। अपने ही कॉलेज में तुमने जितने घपले किये और सालों साल परीक्षाओं के पेपर लीक करने के अपराध में , में तुम्हें गिरफ्तार करता हूँ। मेरी ही चोरी की हुई  थीसिस  से भी , लगता है तुमने कुछ सीखा ही नहीं।राकेश ने प्रमोद के कंधे पर हाथ रखा।  पुलिस के घेरे में प्रमोद कुछ कहने लायक नहीं रहा। 

त्रिभवन कौल

Saturday, 6 January 2018

Loving memories



Loving memories
---------------------

Roaming I am reminiscing memories
Song of love flash time and again
Spreading in the air, to inhale
Breathing so deep to recite again.

Looking at me with astonishing eyes
The blizzard gives news of my arrival
No wrong doer understands me
Relating with  relationship, not so trivial.

Comes ego in between us
Love is so profound and unreeling
Yet words always lack expression
Why has tongue no habit of speaking ?

Why has tongue no habit of speaking ?
---------------------------------------------------------
All rights reserved/Tribhawan Kaul
image : A still from film Mugl-e-Azam. Curtsey Google

Wednesday, 3 January 2018

हाइकु श्रृंखला -2

उज्ज्वल सूर्य 
लुप्त होते सितारे
शोषित बच्चे I
----------------------- 

वसंत ऋतु
राग-रंग उत्सव 
पिघले बर्फ I
----------------- 

पर्वत श्रेणी 
सर्पिल पथ राही 
चै वृंदगान I

-------------------

प्रेम के क्षण 
बेहतरीन पल 
बददुआएं I
-------------------- 

झरते पात
स्वर्ण, भूरे, पीताभ
नग्न चित्रण I

----------------------

सर्दी की ऋतू
ठिठुरते मनुष्य

सिवाय दिल I
------------------------
सर्वाधिकार सुरक्षित / त्रिभवन कौल 

Thursday, 28 December 2017

HEARTBREAK ( Translated into French )

Dear friends
This is the 15th poem of mine which has been translated into French by none other than Honourable Athanase Vantchev de Thracy, World President of Poetas del Mundo , undoubtedly one of the greatest poets of contemporary French.
===================================================================

HEARTBREAK
-----------------
Silvery rays from the sky
will have no meaning now
never same will be the dawn.
Waves shirk to embrace beach
day sobs, night weeps
breeze no longer rustles the leaves.
Flowers robbed of their magic
fragrance no more validating their love
cuckoo loses her voice and
wait becomes redundant for dusky eyes.

Heart is drained of emotions
mind in the process of evaluation
body limited to the motions,
as some one dearest
to the heart, mind and soul
first  loved, then left
never to return.

--------------------------

All rights reserved/Tribhawan Kaul

CRÈVE-CŒUR

Les rayons argentés tombant du ciel
N’auront maintenant aucun sens.
L’aube ne sera plus jamais la même.
Les vagues se refusent à embrasser la plage,
Le jour sanglote, la nuit pleure,
La brise ne fait plus bruire les feuilles.
Les fleurs sont dépouillées de leur parfum magique
Qui n’enchante plus leur amour.
Le coucou perd sa voix et
L’attente devient superflue pour les yeux assombris.
Le cœur est asséché de ses émotions,
L'esprit se remet en question,
Le corps est réduit à des mouvements mécaniques,
Quand la personne la plus chère
Au cœur, à l'esprit et à l'âme
D’abord aimée, est partie
Pour ne revenir jamais.
----------------------------------
Traduit en français par Athanase Vantchev de Thracy
Translated into French by Athanase Vantchev de Thracy
---------------------------------------------------------------------------------
Born on January 3, 1940, in Haskovo, Bulgaria, the extraordinary polyglot culture studied for seventeen years in some of the most popular universities in Europe, where he gained deep knowledge of world literature and poetry.
Athanase Vantchev de Thracy is the author of 32 collections of poetry (written in classic range and free), where he uses the whole spectrum of prosody: epic, chamber, sonnet, bukoliket, idyll, pastoral, ballads, elegies, rondon, satire, agement, epigramin, etc. epitaph. He has also published a number of monographs and doctoral thesis, The symbolism of light in the poetry of Paul Verlaine's. In Bulgarian, he wrote a study of epicurean Petroni writer, surnamed elegantiaru Petronius Arbiter, the favorite of Emperor Nero, author of the classic novel Satirikoni, and a study in Russian titled Poetics and metaphysics in the work of Dostoyevsky.
============================================






========================

Tuesday, 26 December 2017

चतुष्पदी (Quatrain-40)


हृदय का धडकना नयी बात नहीं है
होंठों का कंम्पन भी खैरात नहीं है
चेहरे की मुस्कान, जो समझे निमंत्रण
प्यार करने की उसमे औकात नहीं है II

hridy kaa dadkna nayi baat nahi hai 
honton kaa kampan bhi khairaat nahi hai 
chehre kee muskaan, jo smjhe nimantran 
pyar karne kee usme aukaat nahi hai.
------------------------------------------
सर्वाधिकार सुरक्षित/मन की तरंग/त्रिभवन कौल

-----------------------------------------------------------

Wednesday, 20 December 2017

वर्ण पिरामिड (61-62)


वर्ण पिरामिड शीर्षक = दलदल / कीचड़ /  पँक आदि समानार्थी शब्द 


क्यों
बच्चे
जीविका
दलदल
अज्ञानी जन 
खोया बचपन
भविष्य रसातल। 
---------------------
क्यों ?
कवि
घुटन
सृजनता
ना सब  राज़ी 
फंसा दलदल
सघन गुटबाज़ी।
-----------------------

 सर्वाधिकार सुरक्षित /त्रिभवन कौल