Saturday, 26 November 2016

Trauma ( Translated into French )

Trauma ( Translated into French )

Dear friends

This is the fourth poem which has been translated into French by none other than  Honourable Athanase Vantchev de Thracy, World President of Poetas del Mundo , undoubtedly one of the greatest poets of contemporary French.


She wakes up
Trembling, frightened, pale faced and humiliated
Day and night
When humans become inhumane
And  shame has no place to hide.

Hunted before the crowds
Molested behind the bushes
Raped in the moving cars
Relatives, friends, goons, terrorists or
By political czars.

Mentally mauled, physically abused
Everyone looks on but never rescued
Nightmarish moments never out of sight
Living dead or deadly living
Soul and body always in fright.

 Tender age matters to none
Everything she dreams, is undone
In a flash, everyone jumps in
To encash
Her innocence, her trauma, her conscience
For five minutes of fame
Putting even THE GOD in shame.


Elle se réveille
Tremblante, effarouchée, livide et humiliée
Jour et nuit
Quand les humains deviennent inhumains
Et qu’elle n’a nul endroit pour cacher sa honte.

Traquée au milieu des foules,
Molestée derrière les buissons,
Violée dans les voitures qui roulent
Par des parents, des amis, des nervis, des terroristes ou
Par les tsars de la politique.

Malmenée dans son esprit, maltraitée dans sa chair, 
Tous voient ça, mais jamais ne lui viennent en aide,
Des instants de cauchemar qu’elle ne révèle à personne,
Vivant dans la mort et morte dans la vie,
L’âme et le corps toujours frissonnant.

Son jeune âge ? Personne ne s’en soucie,
Tout ce à quoi elle rêve tombe en ruine,
En un éclair, chacun se précipite pour profiter
De son innocence, de son traumatisme, de sa conscience –
Pour cinq minutes de gloriole
Faisant honte à Dieu lui-même.

Translated into French by Athanase Vantchev de Thracy
Vantchev Athanase de Thracy is undoubtedly one of the greatest poets of contemporary French. Born on January 3, 1940, in Haskovo, Bulgaria, the extraordinary polyglot culture studied for seventeen years in some of the most popular universities in Europe, where he gained deep knowledge of world literature and poetry.

Athanase Vantchev de Thracy is the author of 32 collections of poetry (written in classic range and free), where he uses the whole spectrum of prosody: epic, chamber, sonnet, bukoliket, idyll, pastoral, ballads, elegies, rondon, satire, agement, epigramin, etc. epitaph. He has also published a number of monographs and doctoral thesis, The symbolism of light in the poetry of Paul Verlaine's. In Bulgarian, he wrote a study of epicurean Petroni writer, surnamed elegantiaru Petronius Arbiter, the favorite of Emperor Nero, author of the classic novel Satirikoni, and a study in Russian titled Poetics and metaphysics in the work of Dostoyevsky.

Friday, 25 November 2016

AN ODE TO 26/11/2008

AN ODE TO 26/11/2008*

I salute those
massacred at CST
martyred at the TAJ
felled in the line of duty
facing military type attack
composure retained
in spite of barbaric brutality.

I salute
the brave commoner
saving lives, though horrified
the fire-fighter, the bravery personified
local policemen, who dared to fight back
seeking to pay back
the nanny who saved the child
when at Chabad,
terrorists had gone wild.

I salute
a widow watching her dreams shattered
India should survive,” she thought,
that is what most mattered.”

I salute
the day 26/11
withstanding the carnage
when everyone jumped in
to limit the damage.

I salute
the never say die spirit of Mumbaites
for resistance shown
making every effort to comfort
known or unknown.

Giving befitting reply to
sinister designs of Pakistan
India has always survived
because my country is known as
Bharat, also Hindustan.

*A note from the poet :- The day 26 November 2008 still lingers. On this day Mumbai (financial capital of India) was attacked by Pakistan based and supported terror organisations. Approx 164 were dead and 308 wounded. Resilience shown by Indian paramilitary forces and citizens was remarkable.

*The poem has been published in 'Refreshing Writes'

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Wednesday, 23 November 2016

आम आदमी की कवितायें

आम आदमी की कवितायें
“गाँधी जी के तीन बंदर
तीनो मेरे अन्दर
कुलबुलाते हैं
बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो
पर देखता हूँ, सुनता हूँ, कहता हूँ. क्यों ?
क्यूंकि मैं एक आम आदमी हूँ”

कवि त्रिभवन कौल की उपर्युक्त पंक्तियाँ उनकी कविताओं का घोषणा पत्र सरीखी हैं।  प्रत्येक साहित्य- सिद्धान्त , नैतिक व आदर्शवादी सीमाओं से परे जा कर आम होते हुए भी अपना अस्तित्व तलाशती यह कवितायें निश्चित रूप से मुक्तिबोध की पंक्तियों का पुनः उद्घोष करती जान पड़ती हैं। 

"विचार आते हैं 
बच्चों की नेकर फचीटते
मरते हुए सांप , पिछवाड़ा "

मुक्तिबोध के उलट यह आम आदमी कवि त्रिभवन कौल का शिल्पगत वैशिष्ट्य है जिसका उत्स कवि के कथन में ' मैं साहित्यकार होने का दावा नहीं करता ' से फूटता प्रतीत होता है।  'मन ', 'कबाड़ीवाला ', 'बस ','बेबसी ', 'रमणीय' तथा 'दुख' इस संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कवितायें हैं।  जिसमे कवि एक आम आदमी की तरह पाठक को अपनी अनुभूतियों से साक्षात कराता है।  

कवि में उन्नत वैचारिकी का आभाव नहीं , अनुभूति की वह गहराई भी है जो सर्वकालिक साहित्य चेतना को गहरे प्रभावित कर सके और अभिव्यक्ति की वह ऊंचाई भी जो पाठक को चमत्कृत कर दे।  ' बेबसी ' शीर्षक कविता में कवि की रचनात्मक संवेदनशीलता एक प्रतीमा का क्या ही सुंदर मनोविश्लेषण प्रस्तुत करती है।

आधी अधूरी प्रस्तर की प्रतिमा को
डर नहीं लगता अब
छेनी और हथोड़े से
डर लगता है तो शिल्पी के मनोस्थिति से

हिंदुस्तानी भाषा अकादमी, दिल्ली से प्रकाशित कवि त्रिभवन कौल रचित ' बस एक निर्झरणी भावनाओं की ' शीर्षक यह संग्रह विशाल  हिंदी परिक्षेत्र में अपनी अलग पहचान कायम करे , इन्ही शुभकामनाओं सहित। 
जय कृष्ण शुक्ल
लेखक,कवि, व्यंग्यकार, और सपांदक
पदरौना (उ प्र )


Bas Ek Nirjharni Bhawnaon Ki (Hindi) available with:-
_/\_दोस्तों पुस्तक उपलब्ध है :- प्रकाशक :- हिंदुस्तानी भाषा अकादमी , 3675 , राजापार्क, रानीबाग़ , दिल्ली -110034 या अमेज़न डॉट इन ( पर I

Tuesday, 22 November 2016

'बस एक निर्झरणी भावनाओं की '

मेरे  द्वारा रचित मेरा तीसरा काव्यसंग्रह    'बस एक निर्झरणी भावनाओं की ' मेरे सम्मानीय साहित्य मनीषियों /  मित्रों के शुभ हाथों में . अपने सभी मित्रों से आग्रह करता हूँ की आप अमेज़न डॉट इन पर जाकर अपनी राय या स्टार वोटिंग ज़ाहिर करें।  तहे दिल से शुक्रिया।
Bas Ek Nirjharni Bhawnaon Ki (Hindi) available with:-
_/\_दोस्तों पुस्तक उपलब्ध है :- प्रकाशक :- हिंदुस्तानी भाषा अकादमी , 3675 , राजापार्क, रानीबाग़ , दिल्ली -110034 या अमेज़न डॉट इन ( पर I

Saturday, 19 November 2016

मुक्तछंद काव्य का शिल्प विधान

मुक्तछंद काव्य का शिल्प विधान

हमेशा जब मुझसे पूछा जाता है कि  मुक्तछंद/ स्वच्छंद छंद/ अतुकांत कविता में आप कवितायेँ क्यों लिखतें हैं तो अनायास ही मुख से निकल पड़ता है भावों के तीव्र वेग मुझे भावों को छंदों में  बांधने का अवसर ही नहीं देते।  जैसे ही भाव आतें हैं , लिख देता हूँ या यूँ कहूं को लिख लिख जाते हैं। मन कहता है, मस्तिष्क समझता है और उँगलियाँ  थिरक उठती हैं कागज़ पर, टंकण मशीन या फिर लैपटॉप के की बोर्ड पर।  यह नहीं कि मैं छंदबंध कविता नहीं लिख सकता, लिख सकता हूँ और लिखी भी हैं  पर जब बात मुक्तछंद की आती है तो मैं कहता हूँ :-  

"रचनायें न तोलो छंद मापनी की तराज़ू में
मेरी भावनाओं को खुला आसमान चाहिए।"
............................................(बस एक  निर्झरणी भावनाओं की/त्रिभवन कौल )

मुझसे फिर पूछा जाता है कि मुक्तछंद की क्या कोई अपनी विधा है ? इसका विधान/ शिल्प  क्या है , जैसे कि दोहों, मुक्तक ,चौपाई,रोला, कुंडलिनी इत्यादि में होता है ?  जवाब तो वैसे होना चाहिए कि छंदमुक्त का अर्थ ही जब छंदों से मुक्त रचना से है तो इसमें छंद विधि -विधान का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता पर मैं समझता हूँ की बेशक छंदमुक्त रचना में वार्णिक छंदों या मात्रिक छंदों की तरह वर्णो की या मात्राओं की गणना नहीं होती पर एक अच्छी  छंदमुक्त रचना का  निम्नलिखित मापदंडों पर आंकलन करना आवश्यक हो जाता है। यही मापदंड मुक्तछंद कविताओं की विधा को दर्शाते और सार्थक करतें हैं। 

1) कहन में संवेदनशीलता :- विषय में विषय के प्रति कवि कीं पूर्ण ईमानदारी और संवेदनशीलता होना आवश्यक है। कवि का अपनी बात रखने के एक ढंग होता है कविता किसी भी प्रकार की क्यूँ न हो, किसी भी विचारधारा को प्रकट क्यूँ न करती हो, असत्य नहीं होती. हाँ उस सत्य को दर्शाने के लिए कल्पना का सहारा एक आवश्यक साधन बन जाता है. चूँकि सत्य हमेशा से कटु रहा है तो विषय के प्रति संवदेनशीलता बरतना कवि का कर्तव्य हो जाता है।

2) प्रभावात्मकता :- जब तक एक छंदमुक्त कविता में सशक्त भाव , सशक्त विचार और सशक्त बिम्ब नहीं होंगे, रचना की प्रभावात्मकता ना तो तीक्ष्ण होगी ना ही प्रभावशाली     कविता अगर केवल भावनात्मक हो या केवल वैचारिक तो पाठक शायद उतना आकर्षित हो जितना की उस प्रस्तुति में जंहाँ दोनों का समावेश हो. कोरी भावनात्मकता  या कोरी वैचारिकता कविता के प्रभाव को  क्षीण ही करतें हैं।

3) भाव प्रवाह :- छंदमुक्त कविता में भावों का निरंतर प्रवाह होना आवश्यक है अर्थात किसी भी बंद में भावों की शृंखला ना टूटे और पाठक को कविता पड़ने पर मजबूर करदे।

4) भाषा शैली :- मुक्तछंद कविता की भाषा शैली अत्यंत ही सहज, सरल और सर्वग्राही होनी चाहिए।  यदि कंही कंही तुकांत भी हो जाए तो कविता का काव्य सौंदर्य निखर उठेगा।  कहने का तातपर्य है  कि मुक्तछंदीय कविता गद्य स्वरूप नहीं लगनी चाहिए।

मुक्तछंदीय कविताओं में कोई नियमबद्धता नहीं है फिर भी उपरोक्त तत्व एक कविता को काव्य सौंदर्य प्रधान करने में और पाठकों के मन में अपनी छाप छोड़ने में सफलता प्राप्त करती है।

“मुक्त छंद का समर्थक उसका प्रवाह ही है। वही उसे छंद सिद्ध करता है और उसका नियमराहित्य उसकी 'मुक्ति"।“
............................................................. सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'/ 'परिमल' #

 महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने मुक्त छंद को हिन्दी काव्य में संस्थापित किया।  उनका उपरोक्त कथन मुक्तछंदीय कविता को छन्दयुक्त कृतियों के मध्य एक सार्थकता प्रधान करता तो करता ही है साथ ही उर्दू के मशहूर शायरे आज़म मिर्ज़ा ग़ालिब  के उस कथन का अनुमोदन करता नज़र आता है  जब  ग़ालिब ने कहा :-

बकर्दे-शौक नहीं जर्फे-तंगनाए ग़ज़ल,
कुछ और चाहिये वुसअत मेरे बयाँ के लिये.............(गालिब)#
(बकर्दे-शौक: इच्छानुसार, ज़र्फे-तंगनाए ग़ज़ल: ग़ज़ल का तंग ढांचा, वुसअत: विस्तार )
मिर्ज़ा ग़ालिब का यह शेर उनकी उस मज़बूरी को बयान करता है जिसमे वे अपनी इच्छानुसार अपनी बात को ग़ज़ल के तंग ढांचे में/ बंदिशों में रह कर नहीं सकते थे और उनको अपनी बात रखने के लिए उन्हें अधिक विस्तार की आवश्यकता प्रतीत होती थी.
मुक्तछंद में रचना करने का साहस अगर पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के उपरांत किसी कवि-शायर ने मुझे दिया है तो वह उर्दू के महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब के इस शेर ने दिया जिसका भाव यह है की कवि बंदिशों में रह कर/ छंदों के विधि विधान में रह कर अपनी भावनाओं को थोड़े विस्तार के साथ या मुक्त हो कर नहीं कह सकता है.

त्रिभवन कौल 
स्वतंत्र लेखक -कवि

# अंतरजाल के सौजन्य से।