Friday, 21 April 2017

Flights From My Terrace: an overview

Flights From My Terrace: an overview

When Dr. Santosh Bakaya’s most awaited book of essays entitled ‘Flights From My Terrace’ landed at my table, I simply stared at it. The book reminded me of my senior school and college days (1962-1967).
“Children/Students write down an essay on My cow/ My House/ Post Office/ My favorite leader etc. (to) If we want peace, be prepared for war/ India is a rich country inhabited by poor / Democracy etc. etc.  I used to detest reading as well as writing abstracts. However it all changed at a much later stage when I read Khuswant Singh and Mulkraj Anand. I learnt that essays needed not be always abstract in nature. It had to have an entertaining value too.

Every essay in Dr, Santosh Bakay’s ‘Flight From My Terrace’ is a story creating myriad of emotions while maintaining interest of its reader in its core subject. An essay needs to give an insight into the mind of a writer too. Every essay in the book tells a story which makes a reader forget about the general nature of an essay and enjoy it as Bakaya wants readers to enjoy. Her exploits, her experiences, her insightful intellect, her experiments with ideas with which she was concerned, all of these have taken shape in a beauty called “Flight From My Terrace”. Dr. Bakaya is successful in creating a magical pot which churns out LIFE, both in livings & non-livings, in its all dimensions through her visual experiences, exploits, happenings and experiments combining all with sheer flights of her imagination from her terrace. Her sense of humor has a telling effect..

In Dr. Santosh Bakaya, a known figure in the world of contemporary english literature, I have found her more of a unique storyteller and less of an essayist for her inherent humorous and satirical takes, her erudite approach to pen down the human feelings in out of box words and her acumen to judge a situation while presenting us a platter with seriousness yet in comic, satirical, engaging tone. The crowning glory is that she judges yet is not judgmental. In fact she has experimented with her flair for writing english in such a mesmerizing way that all shades of life come to life for readers to glide over.

Small, fluffy clouds chased each other, bursting into a vibrant dance every now and then. Nature had turned into choreographer now perfectly conceptualizing…………Life was fun, the clouds seemed to say”/ A night unfolds.

“ Dad grunted and suddenly looked like a sinister cloud ready to unleash is wrath on everyone around”/A Pyrrhic Victory

“The merry scarecrows fails to send her into raptures of joy, the veiled women riding pillion failed to excite her, the goats and donkeys did not send her into a tizzy”/I am not a cannibal.

Malik in ‘Fear’ gives you creeps while going through his trauma of being a subject getting involved and witnessing riotous situation while dreaming of saving himself through a fantasy of Superman and the irony is boy is not sure to which side he should be./Fear

“The garbage box was bursting at the seams with garbage, not unlike the mind of a pervert which is spilling over with obscene thoughts.”/An the mountain moved.

These examples are only tips of icebergs. As every essay ( Am I fooling myself !)  unfolds itself in the lap of its reader, it gives an insight into the thoughts of the writer working on a family (a teenager, a father), animals, garden, clouds, flowers, birds, memories, journeys, homecoming etc. in a language which at times allow one to marvel at astute description that present visual effects in words before a reader. “ Communication, The Wall , In the blink of an eye, Back Home and so many other compositions are reflective and expository flourishing with ideas, knowledge, behavioral insight and personal experiences.  A reader will definitely wonder encountering the use of unheard of phrases, expressions making one  getting  engrossed in the plot bringing forth an element of curiosity associated with the subject.

Dr.Santosh Bakaya is a poet at heart and writer with extraordinary writing acumen.  The poems in some of her writes  like : Dream on, First Steps, Joint Ventures, The Spirit Triumphs etc enhance the charm of story telling rather than act as speed breakers.

As an Indian reader having brought up on Indian english rather than English english, I am inclined to feel essays should have  an argument and counter argument which I am missing. She is, as I feel, the finest story teller rather than an essayist. Moreover since the book may also pass through general readers, such readers may not be able to grasp the complex sentences structured while going through a subject. Yes, a reader from literature can.

In short I must say Dr. Bakaya’s “Flight From My Terrace” presents us mainly nostalgic feelings accumulated through the years in word art par excellence. Every subject is brought to life and beautifully written about. The fact is that the whole ambience of the work lies in  narrative expressions which is stunning at times.  Wishing her many more such take offs.

Tribhawan Kaul
Freelance writer-poet

Wednesday, 12 April 2017

वर्ण पिरामिड (43-44)

वर्ण पिरामिड – ईंट
प्राचीन शान 
वस्तुशिल्प भान 
यज्ञ या शमशान
तपी ईंट
सुदृढ़ नीव
छुए आसमान
देश की पहचान
सर्वाधिकार सुरक्षित /त्रिभवन कौल



प्रेरणा ------- क्यों है खालीपन का भास तुम्हारे बिना अकेलेपन का है अहसास तुम्हारे बिना निष्क्रियता ने झकड़ा दिलो दिमाग को लेखन का छूटा अभ्भ्यास तुम्हारे बिना। kyun hai khaalipn kaa bhaas tumhare bina akelepn kaa hai ehsaas tumhare bina nishkriyta ne jhakda dilon dimaag ko lekhan kaa choota abhyaas tumhare bina. ----------------------------------------- सर्वाधिकार सुरक्षित /त्रिभवन कौल

Tuesday, 11 April 2017

पर्पल पेन समूह द्वारा प्रकाशित साझा काव्य संग्रहों का भव्य विमोचन

पर्पल पेन समूह द्वारा प्रकाशित साझा काव्य संग्रहों - काव्याक्षर व काव्य सुरभि का भव्य विमोचन
वसुधा कनुप्रिया नई दिल्ली , पर्पल पेन सृजनात्मक समूह द्वारा प्रकाशित साझा काव्य संग्रहों -- काव्याक्षर व काव्य सुरभि का भव्य विमोचन कल, रविवार दिनांक 09 अप्रैल, 2017 को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर ऐनेक्सी, नई दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त उस्ताद शायर मंगल नसीम, प्रसिद्ध कवि व दूरदर्शन के पूर्व महानिदेशक लक्ष्मी शंकर वाजपेयी, वरिष्ठ साहित्यकार एवं दोहाकार नरेश शांडिल्य व सुविख्यात कवयित्रि ममता किरण के कर कमलों द्वारा सम्पन्न हुआ । समूह की संस्थापक एवं संचालक वसुधा 'कनुप्रिया' द्वारा संपादित दोनों संग्रहों में 55 रचनाकारों की कवितायें संकलित हैं । काव्याक्षर में सर्व श्री/सुश्री कमल कांत शर्मा, डॉ गुरविंदर बांगा, अनु शर्मा पांडे, श्रीराम मूर्ति, डॉ प्रिया सूफ़ी व वसुधा 'कनुप्रिया' की रचनायें हैं । हिंदी साहित्य के प्रचार-प्रसार व हिंदी भाषा के संवर्धन के लिये प्रयासरत पर्पल पेन समूह ने भारत के विभिन्न राज्यों से 55 रचनाकारों की कवितायें बिना सहयोग राशि के प्रकाशित की जिनमें समसामयिक विषयों व सामाजिक कुरीतियों से लेकर प्रेम, आधात्म, दर्शन आदि विभिन्न विषयों पर भावपूर्ण व सार्थक रचनायें प्रस्तुत की गई हैं । इस प्रयास के लिये सभी गणमान्य अतिथियों ने वसुधा कनुप्रिया की प्रशंसा की व भविष्य के लिये शुभकामनाएँ दीं । उस्ताद शायर मंगल नसीम ने नवोदित रचनाकारों को ग़ज़ल लेखन संबंधित जानकारी देते हुए एक सच्चे गुरु की तरह उनका पथ प्रदर्शन किया व हौंसला बढ़ाया । आपने अपनी ग़ज़लों के शेर कुछ यूँ पढ़ें --
बुलंदियों पे पहुँचने का है ग़ुरूर जिन्हें
वो ये भी जान लें आगे ढलान बाक़ी है
जहां में कितने सिकंदर नेपोलियन आये
भला किसी का भी कोई निशान बाक़ी है
शानदार अंदाज़ में अपनी लाजवाब शायरी से मुख्य अतिथि श्री मंगल नसीम ने कार्यक्रम को ऊँचाई प्रदान की ।
अध्यक्षीय भाषण में लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ने दोनों पुस्तकों पर अपनी समीक्षात्म टिप्पणियाँ देते हुए नये रचनाकारों को कविता सृजन संबंधित उपयोगी बातें बताईं । श्रोताओं के आग्रह पर उन्होंने कुछ माहिया भी सुनाये ।
वरिष्ठ साहित्यकार व प्रसिद्ध दोहाकार नरेश शांडिल्य ने भी दोनों पुस्तकों पर अपनी सार्थक समीक्षा देते हुए अपने कुछ सुंदर और सार्थक दोहे पढ़े।
विशिष्ट अतिथि कवयित्री ममता किरण ने अपनी सबसे मशहूर रचना 'इंतज़ार' के साथ साथ तरन्नुम में एक ग़ज़ल भी पढ़ी ।
इस अवसर पर पर्पल पेन समूह की ओर से साहित्य के प्रचार और संवर्धन में संलग्न तीन मीडिया कर्मियों को सम्मानित किया गया। लखनऊ व दिल्ली से प्रकाशित समाचार पत्र 'ट्रू टाइम्स' के संपादक राजेश्वर राय को व 'ट्रू मीडिया' के संपादक ओम प्रकाश प्रजापति को 'साहित्य साधक सम्मान' प्रदान किया गया । भोपाल से प्रकाशित दैनिक लोकजंग के संपादक सैफुद्दीन सैफ़ी यह स्म्मान आगामी कार्यक्रम में ग्रहण करेंगे ।
काव्याक्षर संग्रह के रचनाकारों अनु शर्मा पांडे, कमल कांत शर्मा, शैलेश गुप्ता, डॉ गुरविंदर बांगा, श्रीराम मूर्ति को 'साहित्य केतु सम्मान के अंतर्गत मोती की माला, अंगवस्त्र, कलम के आकार की एक सुंदर ट्राॅफी व प्रशस्ति पत्र दिया गया ।
काव्य सुरभि संग्रह में व इस लोकार्पण में सम्मिलित लगभग 25 रचनाकारों को 'काव्य सुरभि सम्मान' प्रदान किया गया जिनमें ---
सर्व सुश्री/श्री त्रिभवन कौल, नीलोफ़र नीलू, अरविंद कर्ण, चंद्रप्रकाश पारीक, रतन राठौर, डाॅ गुरविंदर बांगा, कमल कांत शर्मा, निशि शर्मा जिज्ञासु, डाॅ प्रिया सूफ़ी, अनु शर्मा पांडे, संजय तिवारी, शैलेश गुप्ता, संजय कुमार गिरि, वंदना मोदी गोयल व राज सिंह भदौरिया प्रमुख थे ।
इस अवसर पर काव्याक्षर व काव्य सुरभि के कुछ रचनाकारों ने अपनी रचनाएं भी पढ़ी !मंच का शानदार सञ्चालन निशि शर्मा जिज्ञासु, ने बहुत ही लाजबाब अंदाज़ में किया !
कार्यक्रम के आरंभ में विशेष रूप से उपस्थित, विभिन्न सृजनात्मक मंचो के संस्थापकों व संचालनकों का भी सम्मान किया गया जिनमें सर्व राम किशोर उपाध्याय, सुरेश पाल वर्मा जसाला, डाॅ चंद्रमणि ब्रह्मदत्त, त्रिभवन कौल, नित्यानंद तिवारी प्रमुख हैं ।
मंचासीन सभी सम्मानित अतिथियों ने रचनाकारों का उत्साहवर्धन किया व शुभकामनाएँ दीं । आदरणीय अतिथियों को भेंट देने के पश्चात पर्पल पेन की संस्थापक वसुधा कनुप्रिया ने उपस्थित सभी गुणीजनों के प्रति आभार प्रकट करते हुए किया ।
=====================रपट संजय कुमार गिरी और वसुधा कनुप्रिया के सौजन्य से 

Sunday, 9 April 2017

Oh God ! Oh Ishwar ! Oh Allah ! ( Translated into French )

 Oh God ! Oh Ishwar ! Oh Allaha ! ( Translated into French )
Dear friends
This is the eight  poem of mine  which has been translated into French by none other than Honourable Athanase Vantchev de Thracy, World President of Poetas del Mundo , undoubtedly one of the greatest poets of contemporary French.
Oh God ! Oh Ishwar ! Oh Allah !
Oh God ! Oh Ishwar ! Oh Allah !
spare all human beings
from untold miseries
from pain, anguish and agonies
these blood sucking vampires
unleashed and roaming free
taking toll of your creations
without any reservations
these monsters and demons
torturing and tormenting
making them crawl through the tunnels of
ordeals and sufferings.

Oh God! Oh Ishwar! Oh Allah!
YOU have been merciful and always great
have mercy on them and relieve them of satanic fate
whatever sin have they committed
this punishment is not warranted
they take birth at your will
can not be left cursed, for diseases to kill.

“Everyone pays according to KARMAs”
repeated cliché, I do not agree
they suffer because YOU only decree
couldn’t YOU be more compassionate
YOU have the power, can alleviate
I apologise for being so rude and bold
I know YOU are in them, in their heart and soul.

 Against all odds, they show the attitude
braving all deadly ailments with fortitude
though they suffer as YOU ordained
yet praying YOU, positivity is  sustained
they look upto you as the only SAVIOUR
from the predators pouncing  to devour
so be kind to all of them, as they propitiate
calling YOU by thousand names
Oh God ! Oh Ishwar! Oh Allah!
name they chant
bless them with YOUR heavenly hand.
All rights reserved/Tribhawan Kaul

Oh Dieu ! Oh Ishwar! Oh Allah !

Oh Dieu ! Oh Ishwar! Oh Allah !
Sauvez tous les êtres humains
De l’indicible misère,
De la douleur, de l'angoisse et de l’affliction –
Ces vampires suceurs de sang
Déchaînés et libres dans leur fureur,
Esprits malfaisant profitant sans aucune mesure
De toutes vos créatures,
Ces monstres et ces démons
Qui les torturent, les tourmentent
Et les font ramper à travers des labyrinthes
D’épreuves et de souffrances.

Oh Dieu! Oh Ishwar! Oh Allah !
Vous qui avez toujours été miséricordieux et grands,
Ayez pitié d'eux, soulagez-les et épargnez-leur,
Quel que soit le péché qu'ils aient commis,
Ce châtiment qui ne se justifie pas.
Ils naissent selon votre volonté
Vous ne pouvez pas les laisser subir la malédiction
Des maladies mortelles.

« Tout le monde paie selon son karma »
Je ne suis pas d’accord avec ce cliché ressassé !
Ils ne souffrent que parce que vous le voulez bien !
Ne pourriez-vous faire montre de plus de compassion ?
Vous avez le pouvoir, vous pouvez soulager leurs peines,
Je suis désolé d'être aussi rude et de m’élever ainsi contre vous,
Vous qui êtes en eux, dans leur cœur et dans leur âme.

Contre toute attente, ils restent fiers,
Bravant tous les maux mortels avec un courage infini
Bien qu'ils souffrent ainsi que vous l’avez ordonné…
Et cependant, ils vous prient d’un cœur toujours bienveillant,
Ils vous supplient et vous glorifient comme leurs uniques Sauveurs
Contre les prédateurs qui se jettent sur eux pour les dévorer.
Aussi soyez gentils avec chacun d’eux,
Car ils essaient de vous rendre favorables en vous saluant de mille noms :
Dieu ! Ishwar! Allah !
Alors, bénissez-les de votre toute puissante main céleste !

Tribhawan Kaul

Traduit en français par Athanase Vantchev de Thracy

Born on January 3, 1940, in Haskovo, Bulgaria, the extraordinary polyglot culture studied for seventeen years in some of the most popular universities in Europe, where he gained deep knowledge of world literature and poetry.
Athanase Vantchev de Thracy is the author of 32 collections of poetry (written in classic range and free), where he uses the whole spectrum of prosody: epic, chamber, sonnet, bukoliket, idyll, pastoral, ballads, elegies, rondon, satire, agement, epigramin, etc. epitaph. He has also published a number of monographs and doctoral thesis, The symbolism of light in the poetry of Paul Verlaine's. In Bulgarian, he wrote a study of epicurean Petroni writer, surnamed elegantiaru Petronius Arbiter, the favorite of Emperor Nero, author of the classic novel Satirikoni, and a study in Russian titled Poetics and metaphysics in the work of Dostoyevsky.

Tuesday, 4 April 2017

' वर्ण पिरामिड भूषण '

04 दिसम्बर 2016 के बिहार (Patna) में सुश्री Vibha Rani Shrivastava जी द्वारा आयोजित 'अथ से इति वर्ण स्तम्भ -वर्ण पिरामिड साझा संकलन ' और 'साझा संग्रह शत हाइकुकार साल शताब्दी 'के भव्य लोकार्पण कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के तौर पर , राजधानी के रद्द होने के कारण, ना जा पाने का खेद  (02-04-2017) को कम हो गया जब , वर्ण पिरामिड के जनक आदरणीय Suresh Pal Verma Jasala जी ने मुझे दिल्ली के रामनगर क्षेत्र में डॉ ब्रजपाल सिंह संत जी के ७५वें जन्मदिवस पर इस' वर्ण पिरामिड भूषण ' ट्रॉफी को प्रधान कर सम्मानित किया I हार्दिक धन्यवाद जी।
युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच के तत्वाधान में हुए इस आयोजन में जहाँ डा.ब्रजपाल सिंह संत जी का युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच की ओर से उन्हें शाल और "उत्कर्ष साहित्य अमृत प्याला " प्रदान कर सम्मानित किया गया वहीँ पर डा.ब्रजपाल सिंह संत जी द्वारा मंच के उपस्तिथ सभी सदस्यों, सर्वश्री Ramkishore Upadhyay जी , Suresh Pal Verma Jasalaजी, Omprakash ओम प्रकाश शुक्ल जी, Sanjay Kumar Giri जी, सुश्री Savita Saurabh जी और इस अकिंचन को भी सम्मानित किया। इस अवसर पर सभी उपस्तिथ कवियों द्वारा अति सुंदर काव्य पाठ का भी सभी ने रसास्वादन किया।उन्ही पलों के कुछ उपलब्ध छायाचित्र आपके अवलोकन के लिए प्रस्तुत हैं। सप्रेम।