Tuesday, 30 May 2017

गीतिका -7 (उसकी महोब्बत में)

उसकी महोब्बत में
नाकाम उसकी महोब्बत में, ख़ाक छाने फिरता हूँ
उसके प्यार का मारा मैं , गाता तराने फिरता हूँ।
फ़लक , ज़मीन ,चाँद तारे, गुल, गुलशन, झरने सारे
याद सजाये जिगर को ग़ज़लों में ‘ साने फिरता हूँ।
इज़हार करूँ प्यार का लहरों की तरह सागर से मैं
सुन ली अरज़ गर मिरी तो सीना स्व ताने फिरता हूँ।
माया जाल शब्दों’ का , मन विश्वास धोखा आकर्षण
गर प्यार सच्चा अनश्वर , क्यों मर्म जाने फिरता हूँ ?
जलता दिया संग तेल -बत्ती के , सृजन रोशन रोशन
द्रिष्टी मन विचार बिम्ब से’ , बुन ताने बाने फिरता हूँ।

सर्वाधिकार सुरक्षित/ त्रिभवन कौल

Friday, 26 May 2017

द्विपदी -15 (Couplet-15)

प्यार को रिश्तों  में बांधना  नहीं लगता अच्छा

बस, उनका आना लगे भला और  जाना बुरा I

(Pyar ko rishton  mei bandhna nahi lagta accha

Bus, unka aana lage bhalla aur jaana bura)
सर्वाधिकार सुरक्षित /त्रिभवन कौल /सबरंग

वर्ण पिरामिड (47-48)

वर्ण पिरामिड शीर्षक =मिटटी /माटी

कुम्हार का चाक
आकार हो साकार
माटी प्रदुषण 
कचरा रसायन

सर्वाधिकार सुरक्षित /त्रिभवन कौल

An event held by Joshe-jazba

On 24th May, 2017 I recited my poems at an event held by Joshe-jazba group of VCF (Veteran Citizens Forum) Budh Vihar,Thane. Thanks Ms. Arati Gupta ji, Sh. Preetam Gulrajani ji and Sh. Anil Agwekar ji

Thursday, 25 May 2017

Musing of an Autistic

Musing of an Autistic
Love knows no boundaries yet lacks conviction
Wondering why the sea is noisy yet so calm
Shore allows waves to touch and back they go
Sand watch helplessly as none applies balm.

Thoughts merge misreading thoughts
Natural are weird ways to reverse actions
Mind seeks answers through hidden potentials
Ready to take off sans pretentions.

Ah! Can’t beat the blues which come free
Hand me something to play and let you see
Acceptance makes me accepted, energizing me
Let the river flow why build dam over me?

Grappling with my mood swings, I enjoy
Look into my eyes and say ‘ahoy’
Learning curves may be like ECG
Life can’t be smooth, so let it be.

Oh! Come now, let you understand
Reassuring touch make me stand
Complexities are boon and not to abhor
Open your arms and open your doors.

Fields ploughed, seeds grow emotions
Nourishment through parent’s devotion
Watch me cross barriers of all kind
Sky is the limit for a beautiful mind.
Sky is the limit for a beautiful mind.

All rights reserved/ Tribhawan Kaul

Images :- curtsy google.com
Note:- The poem has been included in Different Truths anthology in April 2017
ps :-This is highly satisfying. My latest poem ‘ Musing of an Autistic’ which was selected and included in Different Truths anthology in April 2017 is going to be declard ‘POEM OF THE DAY’ on 10th June, 2017 by one of the most prestigious international poetic website Poemhunter.com . Received an e-mail to that effect yesterday (27th May 2017). The poem has been posted on my timeline on 25th May 2017. Please scroll down to read, if interested. 
PoemHunter.Com <noreply@poemhunter.com>
To Tribhawan Kaul 27 May at 1:05 PM
Dear Poet;
We chose your "Musing Of An Autistic" poem as 'Poem of The Day from A Member' and on 6/10/2017 it will be sent to all 'MemberPoem Bulletin' members.
It will also be on the main page on that day, and it will be listed on 'Poem of The Day from A Member' calendar.
Your "Musing Of An Autistic" poem will also be posted to our social media pages:
Poemhunter.com Facebook page: http://www.facebook.com/PoemHunterCom
Poemhunter.com Twitter page : http://twitter.com/#!/PoemHunterCom
We thank you for your contribution to our site.

Tuesday, 23 May 2017

चतुष्पदी (Quatrain)-35

# Destruction of Pak posts. & Saluting to Major Gogoi

यह देश मेरा, चमन मेरा, एक फूलों का गुलदस्ता है

रणबांकुरे पग पग मिलेंगे, हर कफ़न बांधे रहता है

मादरे वतन तेरी हिफाज़त, मेरा धर्म है और कर्म भी

ग़लतफ़हमी शायद दुश्मनों को, भारत सोया रहता है

Yah desh mera, chaman mera, ek phoolon kaa guldasta hai 

Runbaankuren pg pg milenge, har kafan baandhe rahta hai 

Maadre vatan teri hifazat , mera dharm bhi aur karm bhi 

Galatfahmi shayd dushmano ko , bharat soya rahta hai .
सर्वाधिकार सुरक्षित /त्रिभवन कौल /बस एक निर्झरणी भावनाओं की

picture curtsy :Google

CRUISE CONTROL ( Translated into French )

Dear friends
This is the tenth poem of mine  which has been translated into French by none other than Honourable Athanase Vantchev de Thracy, World President of Poetas del Mundo , undoubtedly one of the greatest poets of contemporary French.

Like, a boat
inspite of warnings
wandering in sea
in choppy waters
rollercoaster ride
high and low waves
of expectations, aspirations,
omissions and commissions
trying to steer clear of
miseries and illusions
bogged down by
wavering & dithering decisions
sailing to set destination
yet drifting to unknown
anchoring to gauge
and wriggling out of
self created mess
by self control
and meditation
directing the ship
to desired destination.
All rights reserved/Tribhawan Kaul

Comme un bateau qui,
En dépit des mises en garde
Erre en mer
Sur des eaux agitées,
Nous offre
Des tours de montagnes russes
Où il faut franchir
Les hautes et basses eaux
Des attentes, des aspirations,
Des oublis et des avantages 
En essayant de nous éviter
Les misères et les illusions
Où nous nous embourbons
À cause de décisions hésitantes et mal à propos
Sur la destination que notre voile doit prendre,
Décisions qui nous font dériver vers l'inconnu.
Elle, la VIE, nous permet de nous ancrer
Où il faut
Pour nous dégager des ennuis
Où nous nous sommes mis,
Et, par la maîtrise de soi
Et la méditation,
Diriger notre navire
Vers le port souhaité.

 Translated into French by Athanase Vantchev de Thracy

Born on January 3, 1940, in Haskovo, Bulgaria, the extraordinary polyglot culture studied for seventeen years in some of the most popular universities in Europe, where he gained deep knowledge of world literature and poetry.
Athanase Vantchev de Thracy is the author of 32 collections of poetry (written in classic range and free), where he uses the whole spectrum of prosody: epic, chamber, sonnet, bukoliket, idyll, pastoral, ballads, elegies, rondon, satire, agement, epigramin, etc. epitaph. He has also published a number of monographs and doctoral thesis, The symbolism of light in the poetry of Paul Verlaine's. In Bulgarian, he wrote a study of epicurean Petroni writer, surnamed elegantiaru Petronius Arbiter, the favorite of Emperor Nero, author of the classic novel Satirikoni, and a study in Russian titled Poetics and metaphysics in the work of Dostoyevsky.

Monday, 22 May 2017


खुद से तू अनजान है 
रब की, तू पहचान है। 

खिल कर फूल यही कहे ,
ना तोड़ो, अपमान है।

सूरज चमके सांझ तक 
झुकता, वह बलवान है।  

श्रम में रत जय श्रमिक तू 
मन से तू धनवान है।

पथ्थर चाक करे धारा 
बनु,,  मेरा अरमान है।
सर्वाधिकार सुरक्षित /त्रिभवन कौल  

Sunday, 21 May 2017

'होंठ पर वनवास ':- एक अवलोकन

'होंठ पर वनवास '

'होंठ पर वनवास ' शीर्षक से मुझको अपने काव्यसंग्रह 'सबरंग ' की दुपदी याद आ गयी।

" ख़ामोशी की भी होती अपनी ज़ुबाँ
होंठ हिलते नहीं, बात हो जाती है ".

मान्यवर जयकृष्ण शुक्ल जी मितभाषी ज़रूर  हैं पर उनकी लेखनी में एक ऐसी पैनी धार , एक ऐसी असाधारण अभिव्यक्ति की क्षमता है जो चुपचाप प्रेम, प्रकृति, वैराग्य,  मानवता जैसे  ज़ज़्बातों को उकेरते हुए सीधे सीधे पाठकों के दिल में उतर जाती हैं।

बचपन से संचित अनुभव सब पाए
जो कागद के लेखे 
वक़्त वक़्त की भट्टी तप कर
नित्य बदलते रिश्ते देखे।I

काव्यसंग्रह ' होंठ पर वनवास '  हमें कवि  की अद्द्भुत शायराना सूफी मिज़ाज़ , श्रृंगारिक काव्याभिवयक्ति , अंतर्मन को छूने वाली अनुभूतियों द्वारा अपनी अंतर्दृष्टि  से तो अवगत  कराती ही है साथ ही अलग-अलग रंगों में ,उन अभिव्यक्तियों में समाविष्ट  अनेक बिम्बों  को , एक विशेषज्ञ चित्रकार की तरह शब्दों में खूबसूरती से चित्रित कर जयकृष्ण जी के  एक प्रवीण रचनाकार का दायित्व का  भी निर्वहन करती दिखाई पड़ती हैं।

भाले का टून्न  हुआ एक एक दाना ,
भोली -भाली चिड़ियों शहर में न आना।I
मृत्यु एक क्षण आनी है वह तो आएगी ,
जान मिली बेगानी है एक दिन जायेगी
भाव-भक्ति में मस्त-मलंग खो जाओ ,
नहीं कंही कुछ अनबन ,
साधो गीत सुनाओ।I

हम शबनम की धुल हो गए ,
प्रिय जबसे तुम फूल हो गए। 
भ्र्मरों का चुम्बन , आलिंगन ,
मुझको चुभते शूल हो गए।I

जीवन प्रेम है या प्रेम जीवन है यह पहेली हमेशा से रचनाकारों के लिए अभूझ रही है।  यह प्रेम कभी आध्यात्मिक रूप तो कभी श्रृंगारिक रूप धर कर कवि की काव्य प्रेम साधना को सफल बनाता है।  प्यार एक शब्द है जो सभी रचनाकारों के लिए  एक अस्पष्टीकृत बहुआयामी भावनात्मक विषय का स्तोत्र रहा है।  भले ही इस रहस्यपूर्ण शब्द पर सामग्रियों का भण्डार ही क्यों ना  उपलब्ध हो, कवियों के लिए यह शब्द हमेशा से गद्य और पद्य के नवीन  सृजन में सहायक रहा है।

 ‘होंठ पर वनवास में भी कविश्रेष्ठ जयकृष्ण शुक्ल जी ने , अपनी रचनाओं में  प्यार के, नेह के, स्नेह के श्रृंगारिक , आध्यात्मिक और सूफियाना स्वरूपों को साकार करने के साथ साथ मानवीय विसंगतियों पर एक गहरी चोट , आधुनिकता में असमानता पर परोक्ष प्रहार, अध्यात्म का रस लिए कवि की पुकार लिए, इस काव्यसंग्रह के द्वारा पाठको को एक असीम आनंद की अनुभूति कराई है।

होंठ पर वनवास  जयकृष्ण शुक्ल जी के विचारों, विश्वासों, अवधारणाओं, छापों और छवियों का एक विस्तार है, जो धीरे-धीरे उनकी  तीक्ष्ण लेखनी के साथ ही गीत और ग़ज़ल  के माध्यम से विकसित होते हैं और काव्य लालित्य एवं आकर्षण को अंत तक बरक़रार रखतें हैं।

साहित्यानुरागी जयकृष्ण शुक्ल जी को हार्दिक शुभकामनायें देते हुए और द पोएट्री सोसाइटी ऑफ़ इंडिया द्वारा प्रकाशित इस काव्यसंग्रह  की  अपार सफलता की कामना करते हुए :-

त्रिभवन क़ौल

स्वतंत्र लेखक- कवि

Wednesday, 17 May 2017

काव्य गोष्ठी

कल दिनाँक (16-05-2017को मुंबई(घाटकोपर) में वर्ण पिरामिड के जनक श्री सुरेश पाल वर्मा 'जसाला ' जी के निवास  पर  एक छोटी सी काव्य गोष्ठी आयोजित की गई। इस काव्य गोष्ठी को सफल बनाने के लिए दूर दराज़ क्षेत्रों  से  सुश्री अंजना मिश्रा जी (मलाड), /श्री सतीश वर्मा जी (अम्बरनाथ) , /श्री विजय मिश्रा जी (मलाड), /श्री राजकिशोर मिश्रा प्रतापगढ़ी जी (वाशी ), /श्री त्रिभवन कौल जी (ठाणेने भाग लिया। डॉ.विनोद कुमार भल्ला जी किसी अपिरहार्य कारणों की वजह से नहीं पाए।  गोष्ठी का संचालन श्री जसाला जी ने अपने ही अंदाज़ बहुत ही सुंदर ढंग से किया।  ओजपूर्ण , श्रृंगार रस , सामजिक विसंगतियों पर , सामयिक घटनाचक्रों पर , ममता पर एक से बढ कर एक रचनायें सुनने को मिली जिसका भरपूर आनंद सभी ने  उठाया। इस गोष्ठी का अंत एक शानदार भोज से हुआ जिसके लिए जसाला जी की बिटिया रानी और श्रीमती जसाला जी की की जितनी तारीफ़ की जाये , कम पड़ेगी।  उनके प्रति हमारा आभार और शुभाशीष। इस अवसर पर आदरणीय सतीश वर्मा जी ने अपनी दो पुस्तकें 'काव्य कुंज' और कहानी संकलन 'स्मृति अरण्य' भी सभी को भेंट की। उनका हार्दिक धन्यवाद। 

Monday, 15 May 2017

द्विपदी -14 (Couplet-14)

नफरत की भी तो ऐसे,कि मेरा दिल ले गए

जो प्यार करते, तो कहर ढह गया होता .

(Nafrat ki bhi to aise, ki mera dil le gaye

Jo pyar karte, to kehar deh gaya hota)
सर्वाधिकार सुरक्षित /त्रिभवन कौल /सबरंग

Tuesday, 9 May 2017

वर्ण पिरामिड (45-46)

वर्ण पिरामिड शीर्षक = गौतम बुद्ध / बुद्ध / बुद्धा

बुद्ध समान 
स्व जनकल्याण 
दुःखमोक्ष प्रदान 

बुद्ध महान 
बोधिसत्व ज्ञान 
है सारनाथ स्थान 
सर्वाधिकार सुरक्षित /त्रिभवन कौल

Monday, 8 May 2017


212 121 221 2

हुस्न -इश्क , चाँद में आग है
मन -मुटाव , अनगिनत दाग हैं।
जिस्म धवल , सीरतें क्या पता
मन मलिन , अधर मधुर राग है।
रोटियां सिके , शहादत मरे
ज़हरदार , पालतू नाग है।
रात गुज़रती , या’दों में मगर
प्रेम में तड़प, फ़क़त भाग है।
पूत सेना’ में नहीं ‘ख़ास’ का
‘आम’ की शहीदी, बस याग* है।
-------------------------------*आहुति /बलि
सर्वाधिकार सुरक्षित/ त्रिभवन कौल

Sunday, 7 May 2017

शोषित या शसक्त

शोषित या शसक्त
मनुष्य इतना गिर सकता हैनिर्भया के साथ हुए दर्दनाक़ और अमानवीय बलात्कार की घटना के अदालत के फैसले ने (सब अपराधियों को मृत्यु ढंड ) एक बार फिर मानव अधिकारों की दुहाई देने वालों के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया होगा। पर एक बात तो तय है  कि तब से अब तक कुछ भी नहीं बदला है। 
मनुष्य इतना गिर सकता है कभी कल्पना भी नहीं की थी...लचर क़ानून और मानव अधिकार वाले (जिसमे स्त्रियां भी सम्मिलित हैं ) तो आड़े आते ही हैं , २१वी शताब्दी का मनुष्य अमानुष होता जा रहा है.. समस्या यह है की कोई ठोस कदम उठाने को कोई तैयार ही नहीं है... जन आंदोलन चाहिए जन आंदोलन.. एक ऐसी व् व्यवस्था जो स्त्रियों के प्रति अमानवीय व्यवहार के लिए पकडे जाने पर सीधा सीधा मृत्यु दंड दे दिया जाना चाहिए, मानव अधिकारों के हिमायतों को नज़रअंदाज़ करके।
नारी की दशा २१वीं शताब्दी में दलितों से भी गयी गुज़री है।  इस देश में , अल्पसंख्कों की , दलितों की, चलिए , वोटों की खातिर ही सही, कम से कम राजनीति के गलियारों से ,मीडिया के आलमदारों से आवाज़ तो उठती है। पर नारी जाती पर दिन पर दिन हो रहे अनाचार, अत्याचार पर बहस और सिर्फ बहस का ही विषय है।  एक कामी के सामने नारी जाती का ना कोई धर्म है, ना जाती,ना  भाषा ,ना आयु , ना देश, ना ही भेष। बस  नारी उसके सामने तो उसका शिकार है।देवी नहीं।
नारी सशक्तीकरण  ने अज्ञान, प्रताडित  और लाचार जीवन जीने को मजबूर  नारी जाती को केवल वास्तुस्तिथि से बस अवगत कराया है ना कि  उनका वास्तविक सशक्तीकरण।  नारी सशक्तिकरण के  मामूली प्रतिशत को अगर हम सम्पूर्ण नारी उद्धार गाथा मान लें तो हम बहुत बड़ी भूल कर रहें हैं। और आप ही बताये की नारी सशक्तिकरण कहाँ तक नारी जाती को  इस बर्बरता से , दुराचारों से , अत्याचारों से बचा पा रही है।  एक दोषी के लिए, एक अपराधी के लिए  नारी नारी ही है चाहे वः अशक्त है या सशक्त , एक  कामुक चाह को पूर्ण करने का जरिया। अब नारी चाहे राजा जो या रंक। नारी से संग अमानवीय ढंग  से व्यवहार करने वालों में जहाँ   एक तरफ बड़े घरों के लोग शामिल हैं तो दूसरी तरफ दुसरे तबके के लोग। चाहे कारण राजनितिक हों या सामजिक। अंततः  भुगतना तो नारी को ही पड़ रहा है।
इसलिए समय की ज़रुरत हैं एक ऐसे दंडविधान की जो कम से कम समय में अपराधी को एक उदाहरणात्मक दंड दे।  दूसरी और नारी जाती को रक्षात्मक पैंतरों की हर संभव जानकारी हर माध्यम से उपलब्ध करनी चाहिए तो शायद ऐसे जघन्य अपराधों में कमी आये।

====================================त्रिभवन कौल